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भूकंप

भूकंप एक ऐसी अद्भुत घटना है जो बिना किसी चेतावनी के घटती है और इसमें जमीन का भयंकर रूप से हिलना और इसमें जमीन तथा इसके ऊपर मौजूद संरचनाओं का बुरी तरह से हिलना षामिल है। ऐसा गतिषील स्थल-मण्डलीय (मूविंग लिथोस्फेरिक) अथवा क्रस्टल (भूपटल) प्लेटों के संचरित दबाव के मुक्त होने के कारण होता है। पृथ्वी की परत 7 बड़ी प्लेटों में बटी हुई है जो कि 50 मील मोटाई वाली होती है जो पृथ्वी के आंतरिक तथा अनेक छोटी प्लेटों के ऊपर धीमी गति से लगातार गतिषील रहती हैं। भूकंप मूलतः विवर्तनिक (टेक्टोनिक) होते हैं अर्थात् जमीन में आने वाले झटकों के होने के लिए गतिषील (मूविंग) प्लेटें जिम्मेदार हैं। किसी आबादी वाले क्षेत्र में एक भूकंप के घटने से अनेक लोग हताहत तथा चोट खा सकते हैं, साथ ही संपत्ति को भारी नुकसान पहुंच सकता है।

भारत में भूकंप का जोखिम

भारत की बढ़ती आबादी तथा इसमें व्यापक रूप से लगातार बढ़ रहे अवैज्ञानिक निर्माण जिनमें बहु-मंजिला आरामदायक अपार्टमेंट, बड़े कारखानों की बिल्डिंगें विशालकाय मॉल, सुपर मार्केट के साथ-साथ मालगोदाम (वेयरहाउस) तथा ईंट-पत्थर से बनी इमारतें शामिल हैं जो भारत को उच्च जोखिम में रखते हैं। पिछले 15 सालों के दौरान, देश ने 10 बड़े भूकंपों को झेला है जिनके कारण 20,000 से अधिक जानें गई हैं। देष के वर्तमान भूकंपीय क्षेत्र मानचित्र के अनुसार (आईएस 1893: 2002), भारत की भूमि का 59% हिस्सा सामान्य से गंभीर भूकंपीय खतरों की चेतावनी के अधीन है:-जिसका अर्थ यह है कि भारत एमएसके तीव्रता VII और उससे अधिक झटकों के प्रति प्रवृति रहता है (बीएमटीपीसी, 2006)। वास्तव में संपूर्ण हिमालय क्षेत्र को 8.0 की तीव्रता वाले बड़े भूकंपों के प्रति प्रवृति माना जाता है और 50 साल की अपेक्षाकृत अल्पावधि में 4 ऐसे बड़े भूकंप आ चुके हैं 1897 षिलांग (तीव्रता 8.7); 1905 में कांगड़ा (तीव्रता 8.0); 1934 बिहार-नेपाल (तीव्रता 8.3); और 1950 असम-तिब्बत (तीव्रता 8.6)। वैज्ञानिक प्रकाषनों में हिमालयी क्षेत्र में एक बड़े शक्तिशाली भूकप के आने की संभावना के बारे में चेतावनी दी है, जिनसे भारत में करोड़ों लोगों की जिंदगी पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

एक समय हिमालय से दूर स्थित देश के हिस्से तथा अन्य इंटर-प्लेट बाउन्ड्रीज विनाषकारी भूकंपों से अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जाती थी। यद्यपि विगत हाल के समय में इन हिस्सों में भी विनाषकारी भूकंप आए हैं, फिर भी हिमालय क्षेत्र में आए भूकंपों की तुलना में इनकी षक्ति कम थी। 1967 में कोयना भूकंप के कारण भूकंपीय जोन मानचित्र में संषोधन करना पड़ा जिसके कारण मानचित्र से गैर-भूकंपीय जोन को हटाना पड़ा। कोयना के ईर्द-गिर्द स्थित क्षेत्रों को भी भूकंपीय क्षेत्र IV में स्थान दिया गया जो कि उच्च जोखिम को दर्षाता है। 1993 में किल्लारी भूकंप आने से भूकंपीय क्षेत्र मानचित्र में और संषोधन करना पड़ा जिसमें अल्प खतरा क्षेत्र अथवा भूकंपीय क्षेत्र I को भूकंपीय क्षेत्र II में विलय कर दिया गया तथा दक्कन (दक्षिण) तथा प्रायद्वीपीय भारत के कुछ भागों को भूकंपीय क्षेत्र III के अंतर्गत लाया गया जिसमें सामान्य खतरा वाले जोनों के इलाके में दिखाए गए क्षेत्र षामिल हैं । हालिया अनुसंधान में सुझाव दिए गए हैं कि जैसे-जैसे इन क्षेत्रों के भूकंपीय खतरों के बारे में जानकारी बढ़ेगी, अल्प खतरा क्षेत्रों के रूप में रखे गए कुछ और इलाकों को उच्च भूकंपीय खतरा क्षेत्रों के रूप में दिखाया अथवा इसका विलोमतः किया जा सकता है।

देश के पूर्वोत्तर भाग में बारंबार समयांतरालों (फ्रिक्वेंट इंटरवल्स) में सामान्य से (हल्का) लेकर बड़े किस्म के भूकंपों का आना जारी है जिनमें ऊपर उल्लिखित 2 बड़े भूकंप षामिल हैं। 1950 से इस क्षेत्र में अनेक हल्के भूकंप आए हैं। एक औसत के अनुसार, इस क्षेत्र में प्रतिवर्श 6.0 से अधिक षक्ति वाला एक भूकंप आया है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी इंटर-प्लेट बाउंड्री पर स्थित है और इनमें बार-बार विनाषकारी भूकंप आते हैं।

भूकंप के जोखिम में वृद्धि षहरीकरण, आर्थिक विकास तथा भारत की अर्थव्यवस्था के वैष्विकीकरण के कारण हुए विकासात्मक कार्यकलापों में हुई तीव्र बढ़ोतरी के कारण हुई है। विनिर्माण और सेवा उद्योगों में उच्च प्रोद्यौगिकी वाले उपस्कर तथा औजारों के उपयोग में हुई वृद्धि ने भी भूमि पर आने वाले अपेक्षाकृत हल्के झटकों के कारण इन उद्योगों को तोड़-फोड़ के प्रति अति संवदेनषील बना दिया है। परिणामस्वरूप, मनुश्य की जीवन की हानि ही भूकंप का बुरा नतीजा अब और अधिक नहीं रही है। किसी भूकंप के बाद स्थानीय अथवा आर्थिक अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करने वाले गंभीर आर्थिक नुकसान के संपूर्ण देश के लिए दीर्घावधिक प्रतिकूल नतीजे हो सकते हैं। यदि कोई भूकंप दिल्ली अथवा मुंबई जैसे महानगर को प्रभावित करता है तो यह असर और भी अधिक बड़े पैमाने पर होगा।